ट्विटर छोड़ क्यों भागे सोनू निगम

(अज़ीजर रहमान, दोहा क़तर से)

पहले जब बॉलीवुड में जब भी किसी एक्टर, सिंगर या मॉडल का कैरियर दांव पर लगता था तो राजनेताओं से अच्छे रिश्ते बनाता था। अब ज़माना बदल गया है, अब सिर्फ राजनेताओं से साफ-सुथरे रिश्ते बनाकर फायदा नहीं होता, अब जरूरत पड़ती है पब्लिक सपोर्ट की।

6 साल पहले बीजेपी के सत्ता में आने के बाद बहुत सारे एक्टर और सिंगरों को यह लगा था कि बॉलीवुड में एक अलग ग्रुप मोदी भक्तों का बना कर आपस में एक दूसरे से काम का आदान प्रदान कर लिया करेंगे।
बॉलीवुड के एक सिंगर हैं अभिजीत भट्टाचार्य। सलमान खान को जिस दिन जेल की सज़ा हुई उस दिन पूरी दुनिया ने इस आदमी को जाना, क्योंकि आमतौर से सिंगर परदे पर दिखते नहीं हैं लोग उन्हें बहुत ज्यादा नहीं जानते हैं, चेहरे से तो बिल्कुल भी नहीं पहचानते हैं।
अभिजीत भट्टाचार्य ने उन मजदूरों का मजाक उड़ाते हुए जो फुटपाथ पर सोते हुए सलमान खान का शिकार बने थे उस दिन कहा था कि जो कुत्ते की तरह सड़क पर सोएगा कुत्ते की मौत मारा जाएगा।
इतना ही नहीं अभिजीत भट्टाचार्य ने बाद में बहुत सारे मामलों मैं अपनी उल्टी-सीधी राए दी। उसके बाद अचानक अभिजीत भट्टाचार्य को लगा कि अब मोदी भक्ति करनी चाहिए, और उसने मुसलमानों को, इस्लाम को और कुरान को बुरा भला कहना शुरू कर दिया।
इन्हीं हरकतों की वजह से अभिजीत भट्टाचार्य को बहुत सारे लोग जानने लगे थे, सोनू निगम जो कि पहले से काफी मशहूर थे उनको अभिजीत भट्टाचार्य से जलन होने लगी & उन्होंने तय किया कि वह अभिजीत भट्टाचार्य से दोगुनी ज्यादा बेवकूफी करके दोगुनी बड़ी कंट्रोवर्सी खड़ी कर सकते हैं।
17 अप्रैल 2017 की सुबह अचानक वह उठे और उन्होंने अजान को लेकर के अजीब अंदाज में अजीब ट्वीट कर डाले। उन्होंने लिखा कि किसी भी धर्म में ऐसा नहीं है कि दिन में पांच दफा लाउडस्पीकर का इस्तेमाल होता हो इस्लाम धर्म ऐसा क्यों है कि रोजाना पांच दफा माइक में अज़ान दे करके सबको जबरदस्ती परेशान किया जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि आपके पैगंबर के जमाने में लाउडस्पीकर था नहीं तो फिर यह चीज अचानक कैसे शुरू हो गई। लास्ट ट्वीट में लिखा कि यह गुंडागर्दी है। इस तरह से फिर बहुत सारे लोग उन्हें जानने लगे जो पहले से नहीं जानते थे। बल्कि वह एक पॉलिटिकल डिबेटर बन गए, इसमें जितना उनको सपोर्ट मिला उससे ज्यादा उनकी बेज्जती होने लगी, मौके की तलाश में थे कि कब मुझे इन सब टीवी के चक्करों से छुट्टी मिले।
आमतौर से सोशल मीडिया पर जो सिलेब्रिटीज हैं वह मजबूर होते हैं कि हर मामले पर अपनी कुछ ना कुछ राय दें, अच्छे कामों का समर्थन करें, और बुरे इवेंट्स पर उनको कंडम करें। सोनू निगम ना सिर्फ अपनी राय देते थे बल्कि टीवी पर जा जाकर के ज्ञान बांटने लगे थे, उनके पास इंडस्ट्री में कोई खास काम नहीं बचा था, रोजाना चैनलों पर जाकर डिबेट में हिस्सा लेना उनका सर दर्द बन गया था।
लेकिन उन्हें बहुत जल्द इस बात का एहसास हो गया कि सोशल मीडिया पर जितने फॉलोअर्स मिलते हैं उतने ही ट्रॉल्स भी मिलते हैं, इसलिए आप बॉलीवुड में किसी भी साफ-सुथरे आदमी को किसी भी कंट्रोवर्सी में जानबूझकर पढ़ता हुआ नहीं देखेंगे, आप खान साहिबान को ही ले लीजिए, सिर्फ आमिर खान ने एक बार हिम्मत की थी कि मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार पर आवाज उठाई अब हमेशा के लिए खामोश कर दिए गए हैं, उनकी और उनकी पत्नी कितनी ट्रोलिंग हुई और उन्हें कट्टरपंथी संगठनों ने इतना बदनाम किया कि उन्होंने दोबारा कभी हिम्मत नहीं की कि अपनी किसी भी मामले में कुछ राय दे सकें। सलमान खान और शाहरूख खान ने तो कभी किसी मामले पर अपना मुंह खोला ही नहीं।

सोनू निगम को भी यह बात समझ में आ गई थी कि टीवी पर डिबेट में हिस्सा लेने से रोजी-रोटी नहीं चलती।
अभिजीत भट्टाचार्य के उल्टे सीधे ट्वीट को लेकर के ट्विटर ने एक दिन उनका अकाउंट सस्पेंड कर दिया बस क्या था सोनू निगम को मौका मिल गया, और उन्होंने उसी दिन ट्विटर से अलविदा कहा।

वैसे तो सभी उलमा, मुफ्ती साहिबान का इस बात पर इत्तेफाक है की अजान से लोगों को तकलीफ ना हो इस बात की कोशिश होनी चाहिए, लेकिन भारत में कोई भी धार्मिक आयोजन बिना लाउडस्पीकर के नहीं होता है, कोई भी ऐसा मंदिर आपको नहीं मिलेगा जान सुबह शाम लाउडस्पीकर में भजन ना लगाया जाता हो, या त्योहारों में भक्ति वाले गाने कई कई दिन तक ना बजते हों। कानून कायदा अलग चीज है लेकिन एक दूसरे को बर्दाश्त करना, शिकायत होने पर सही तरीके से जा कर के अपनी बात रखना बहुत जरूरी है। सोशल मीडिया पर बवाल खड़ा करने से वह मामला पूरी तरह से पॉलिटिकल हो जाता है, और आमतौर से ऐसे मामले का हल नहीं निकल पाता।

सोनू निगम को अज़ान से तकलीफ थी लेकिन वो कई महीनों से दुबई में रुके हुए हैं, जहां पांच टाइम अजान होती है, सवाल यह है कि क्या वहां सोनू निगम ने इसके खिलाफ कोई आवाज उठाई है या उठा सकते हैं? या सिर्फ अपने देश में माइनारटीज के खिलाफ आवाज उठाना ज्यादा आसान होता है?

(यह लेखक के अपने निजी राय है, NewsPlanet की राए नहीं।)

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